Sunday, January 16, 2011

कम्बख्त वक्त.


कम्बख्त वक्त नज़ारे को बदल देता है।

शांत धरती को शौर-गुल मे बदल देता है।
काले बदलों को बरसात मे बदल देता है।
कम्बख्त वक्त नज़ारे को बदल देता है।

किसी आदमी की शोहरत को बर्बादी मे बदल देता है।
ठीक-ठाक आदमी को बिमारी मे बदल देता है।
किसी की इमानदारी को बईमानी मे बदल देता है।
इंसान की वफादारी को गद्दारी में बदल देता है।
कम्बख्त वक्त नज़ारे को बदल देता है।

हंसते हुए चहरे को मायूसी मे बदल देता है।
किसी की दोस्ती को दुश्मनागी मे बदल देता है।
खूबसुरत आँखों को आसुओं से भर देता है।
कम्बख्त वक्त नज़ारे को बदल देता है।

गली-मौहल्लों को खोफनाक जगह मे बदल देता है।
तेज़ हवाओं को आंधी मे बदल देता है।
गर्मी के मौसम को सर्दी मे बदल देता है।
जीते-जागते इंसान को मौत मे बदल देता है।
कम्बख्त वक्त नज़ारे को बदल देता है।

ये सिर्फ मैं नही कहता, इस जहां का कतरा-कतरा कहता है।
कि कम्बख्त वक्त नज़ारे को बदल देता है।

raajneet.

No comments:

Post a Comment